मुनि जालक की तपो भूमि के रूप मे जालौन जिले का उद्भव हुआ । यह जिला देश के उन कुछ जिलों में एक है। जिसका मुख्यालय उसके जिले के नाम वाले नगर से अलग है। इस जिले का मुख्यालय उरई नामक शहर मे स्थित है। इस क्षेत्र को महाभारत काल से संवधित भी माना जाता है। यहां पर पांडवो के द्वारा अज्ञातवास का समय बिताये जाने का उल्लेख मिलता है। इस जिले की एक प्रमुख तहसील कालपी का सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहा है। इसको बुंदेलखंड का प्रवेशद्वार भी कहा जाता रहा है। यह क्षेत्र चन्देल राज्य का एक महत्वं पूर्ण भाग रहा । इस काल के राजा माहिल का आल्हा खण्ड मे विस्तृत वर्णन है । चदेल काल में इस क्षेत्र में स्थापत्तय की दृष्टि से कई झील एवं महलों का निर्माण किया गया था । इसके पश्चात यह क्षेत्र मुस्लिम आक्रमणकारीयों से होते हुये बुंदेला राजाओ र्के अधीन आ गया । इस काल मे यहां बुन्देली संस्कृति विकसित हुई । महाराजा छत्रसाल के मुगल संघर्ष के दौरान पेशवा वाजीराव से सहयोग लिया गया था उसके प्रतिसाद मे जो इलाका प्रदान किया गया उसमें जालौन जिले का क्षेत्र भी सम्मलित था। मराठा शास के दौरा यह क्षेत्र गाविंद राव के नेतृत्व में था । अंग्रेजों का शासन लगभग 1806 के तहत स्थापित हुआ था। 1858 मे अंग्रेंजो के विरुद्ध युद्ध में तात्या टोपे द्वारा इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ छापा मार युद्ध हेतु लिया गया था। रानी लक्ष्मी बाई एवं तात्या टोपे ने सर हूरोज के विरुद्ध कालपी का भीषड़ पूद्ध किया गया था। इसके साथ ही यहां के एक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री वीर सिंह जोध अटैया जी का भी अंग्रेजो के साथ संघर्ष में महत्वपूर्ण योगदान है ।
रांगड का किला जगम्मनपुर का किला वीरबल का रंग महल कुठौंध के लौरी गांव का चंदेल कालीन सूये मंदिर लंका मीनार इस क्षेत्र के प्रमुख् स्थापत्य के मानदंड है। यमुना एवं वेतवा के दोआब का यह समृद्ध क्षेत्र औद्योगिक रूप से अपने हस्त नि र्मित कागज उद्योग हेतु भी विशिष्ट पहचान रखता है ।